मंत्री पत्नी की कंपनी को करोड़ों का भूखंड डॉ. गुप्ता ने उठाए RDA पर तीखे सवाल, जनहित के नाम से ₹800 करोड़ की कमाई !!

रायपुर, 29 सितम्बर। रायपुर के ईएनटी विशेषज्ञ एवं समाजसेवी डॉ. राकेश गुप्ता ने बताया कि उनके द्वारा एक मंत्री की पत्नी की कंपनी राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड से संबंधित मामला उजागर किया है। कंपनी में मंत्री की पत्नी निदेशक हैं। कंपनी की लगभग 1.33 एकड़ भूमि कचना रायपुर के नालापारा क्षेत्र में स्थित है, जिसका पहुंच मार्ग बस्ती के एक संकरे रास्ते से होकर जाता है और जिसकी बाजार कीमत भी कुछ लाख रुपये तक ही बताई जा रही है।

डॉ. गुप्ता के अनुसार, इस भूमि के बदले 150 फीट चौड़ी प्रस्तावित MR-43 सड़क पर, सड्डू चौक के पास, 23,327 वर्गफीट का प्लॉट क्रमांक 25 आवंटित किया जाना प्रस्तावित है। सड़क के निर्माण के बाद इस प्लॉट का मूल्य 20 करोड़ रुपये से अधिक हो जाने की संभावना है। मामले के सार्वजनिक होने के बाद रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने कल देर रात योजना के संबंध में एक विज्ञप्ति जारी की है।
डॉ. गुप्ता के तीखे सवाल: संकरी सड़क वाली जमीन के बदले 150 फीट सड़क पर प्लॉट क्यों?
राधिका पैलेस नाम की कंपनी में डायरेक्टर मंत्री पत्नी की नालापारा कचना रायपुर की संकरी सड़क का फोटो जारी करते हुए,डॉ. राकेश गुप्ता ने सवाल उठाया कि जब स्वयं RDA ने बताया है कि योजना में 12 मीटर चौड़ी सड़क का प्रावधान भी है, तो उक्त कंपनी की सकरी सड़क में स्थित जमीन के बदले 12 मीटर सड़क पर ही प्लॉट क्यों नहीं दिया गया? उन्होंने प्रश्न किया कि कंपनी की जमीन के बदले में बहुत चौड़ी 45 मीटर यानी 150 फीट चौड़ी प्रस्तावित सड़क पर, प्लॉट से लगभग एक किलो मीटर दूर सड्डू चौक के पास प्लॉट क्रमांक 25 का आवंटन प्रस्तावित क्यों किया गया? डॉ गुप्ता ने कहा कि RDA का कहना कि अभी आपति बुलवाई गई है आपति योजना से प्रभावित पक्ष ही दर्ज कर सकता है। उन्होंने पूछा कि सड्डू चौक के पास 150 फीट की सड़क पर प्लाट मिलने पर प्रभावशाली व्यक्ति की कंपनी भला खुद क्यों आपति दर्ज करेगी?
योजना में कंपनी की जमीन को शामिल करना क्या जरूरी था?
डॉ. गुप्ता ने अधिकारियों से यह भी सवाल किया कि कंपनी की जमीन को योजना में शामिल करने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी? क्या उस जमीन को योजना में शामिल किए बिना योजना को पूरा करना संभव नहीं था? उन्होंने कहा कि संबंधित जिम्मेदार अधिकारी इस बात को स्पष्ट करें कि कंपनी की जमीन को योजना में शामिल करने के पीछे क्या जरूरत आ पड़ी थी?
नगर विकास योजना नहीं, सड़क विकास योजना—जनता से टैक्स किसलिए वसूला जाता है?
डॉ. गुप्ता ने कहा कि यह नगर विकास योजना नहीं, बल्कि सड़क विकास योजना है। एम.आर.-43 के अंतर्गत सड़क के किनारे की लगभग 18 हेक्टेयर जमीन लेकर मुख्य रूप से 4.5 किलोमीटर लंबी एम.आर.-43 सड़क बनाई जानी है। ऐसे में इसके लिए 95.271 हेक्टेयर क्षेत्र में इतनी बड़ी नगर विकास योजना लेना कितना आवश्यक है, वह भी भू-स्वामियों से 60 प्रतिशत जमीन लेकर और केवल 40 प्रतिशत ही जमीन वापस करके?
जबकि गुजरात में जमीन वापसी का यही उल्टे क्रम में है.
डॉ. गुप्ता ने आरोप लगाया कि यह छत्तीसगढ़ का पहला उदाहरण है, जहां नगर विकास योजना के नाम पर भू-स्वामियों से जमीन लेकर मास्टर प्लान की मेजर रोड बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि सड़क निर्माण के लिए भूमि आवश्यक है, तो वैधानिक प्रक्रिया के तहत आवश्यक भूमि लेकर सार्वजनिक धन से सड़क बनाई जा सकती है। आखिर जनता से टैक्स किसलिए वसूला जाता है? RDA का गठन धन अर्जन के लिए नहीं किया गया है!
यह कैसी नगर विकास योजना—न सेक्टर, न गार्डन, न स्कूल, न डेयरी?
डॉ. गुप्ता ने बताया कि इससे पहले देवेंद्र नगर, शैलेंद्र नगर और कमल विहार जैसे सुव्यवस्थित, सेक्टर आधारित आवासीय क्षेत्रों के विकास के लिए नगर विकास योजनाएं लाई गई थीं। ये योजनाएं किसी मेजर सड़क के निर्माण के लिए नहीं लाई गई थीं। लेकिन वर्तमान योजना मुख्य रूप से मेजर रोड के निर्माण तक सीमित दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 49(3)(e) के तहत योजना में गार्डन, डेयरी, स्कूल और परिवहन सुविधाओं के लिए स्थान चिन्हित एवं आबंटित किया जाना है। उन्होंने सवाल उठाया कि 95 हेक्टेयर के योजना क्षेत्र में इन सुविधाओं के लिए भूमि चिन्हित और आबंटित क्यों नहीं की गई? वास्तव में प्राधिकरण इन स्थानों को बेचकर बाद में उनसे मोटी कमाई करना चाहता है.
भू-स्वामियों की भूमि पर RDA को ₹800 करोड़ का लाभ?
डॉ. गुप्ता ने बताया कि 95 हेक्टेयर की योजना में RDA ने करीब 17.50 हेक्टेयर यानी कुल 18.80 लाख वर्गफीट भूमि अपने पास रखी है, जिसमें लगभग 190 मिश्रित भू-उपयोग के बिक्री योग्य भूखंड हैं। ये मुख्य मार्ग और चौराहों की प्राइम लोकेशन पर स्थित हैं। उन्होंने कहा कि करीब ₹5,000 प्रति वर्गफीट की न्यूनतम दर से भी इन भूखंडों का अनुमानित मूल्य करीब ₹1,000 करोड़ है, जबकि RDA के अनुसार सड़क एवं अन्य विकास कार्यों पर लगभग ₹208 करोड़ खर्च होना है। इस आधार पर भू-स्वामियों की भूमि की कीमत पर RDA को करीब ₹800 करोड़ का लाभ होगा । डॉ. गुप्ता ने सवाल उठाया कि जब योजना का मुख्य उद्देश्य मेजर रोड का निर्माण है, तो भू-स्वामियों की भूमि से इतनी बड़ी बिक्री योग्य संपत्ति तैयार कर RDA के पास रखने का औचित्य क्या है? इसे जनहित की योजना कैसे कहा जा सकता है?
क्या 11.50 एकड़ का भूखंड वास्तव में विकसित भूखंड है?
डॉ. गुप्ता ने बताया कि अंतिम भूखंड आवंटन में निजी भू-स्वामियों को 109 अंतिम भूखंड, कुल लगभग 77.69 एकड़ में दिए जा रहे हैं। इनमें 15 भूखंड एक एकड़ से बड़े हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 54.25 एकड़ है, अर्थात 70% भूखंड एक एकड़ से बड़े हैं। इनमें 11.50, 7 और 3-3 एकड़ तक के बड़े भूखंड शामिल हैं। इन भूखंडों में आंतरिक सड़क, नाली, पानी, बिजली आदि के विकास का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है, यानी बाद में भू-स्वामियों को अपने खर्च पर ये सब करना होगा, तो प्राधिकरण इन्हें किस अर्थ में विकसित भूखंड कह रहा है। उनके अनुसार, इस व्यवस्था से RDA बड़े भूखंडों के आंतरिक विकास पर होने वाले खर्च से बच रहा है और उसका भार भू-स्वामियों पर डाल रहा है। डॉ. गुप्ता ने उदाहरण देते हुए कहा कि लगभग 28 एकड़ भूमि के बदले 11.50 एकड़ का अंतिम भूखंड मिलने पर, यदि भू-स्वामी उसका लेआउट विकसित करता है, तो आंतरिक सड़कों और अन्य सुविधाओं में बड़ी भूमि चली जाएगी और लगभग 6 एकड़ ही बिक्री योग्य भूमि बचने की स्थिति बन सकती है।
क्या संयुक्त प्लॉट देने हेतु सहमति ली गई?
डॉ. गुप्ता ने बताया कि प्राधिकरण का कहना है कि भू-स्वामियों की खंडित स्वामित्व वाली भूमियों को खसरा नंबर के आधार पर एकीकृत कर पूर्ण रकबे हेतु एक अंतिम भूखंड का आवंटन किया गया है। उन्होंने पूछा कि संयुक्त प्लॉट देने के पहले धारा 50(3)(ii)(h) के तहत भू-स्वामियों से सहमति ली गई है?
डॉ. गुप्ता ने अधिकारियों से अपील की है कि वे अपनी अंतरात्मा से पूछें कि वे जो कर रहे हैं, क्या वो नैतिक रूप से सही है?
डॉ. राकेश गुप्ता
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