नई दिल्ली। Live In Relationship Law: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कानूनी प्रश्न पर विचार करने का निर्णय लिया है—क्या लिव-इन रिलेशनशिप या विवाह जैसे संबंध में रह रही महिला पुरुष के खिलाफ दहेज प्रताड़ना (आईपीसी की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता, 2023 की समकक्ष धारा) के तहत मुकदमा चला सकती है? यह मामला वैवाहिक कानून और आपराधिक दायित्व की सीमाओं को स्पष्ट करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। साथ ही एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से सहयोग मांगा गया है। कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को भी नोटिस जारी किया है।
यह याचिका शिवमोग्गा के हृदय रोग विशेषज्ञ लोकेश बी.एच. द्वारा दायर की गई है, जिसमें 18 नवंबर 2025 को कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील आनंद संजय एम नुली ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने उन एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया, जो एक ऐसी महिला द्वारा दर्ज कराई गई थीं, जो उनकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धारा 498ए का कठोर प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू हो सकता है। हालांकि याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह व्याख्या सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के विपरीत है और दहेज प्रताड़ना का अपराध केवल विधिक रूप से स्थापित वैवाहिक संबंध पर लागू होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता नीना आर. नरीमन को एमिकस क्यूरी नियुक्त करते हुए 9 मार्च 2026 तक लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा है। इस मामले में आने वाला फैसला लिव-इन संबंधों की कानूनी स्थिति और आपराधिक कानून के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण नजीर स्थापित कर सकता है।




