SCIENCE NEWS: जहरीले बिच्छुओं का गुप्त ठिकाना बेनकाब, नई स्टडी से हाई-रिस्क इलाकों की होगी सटीक पहचान
हर साल 3,000 बच्चों की मौत का कारण बन रहे जहरीले बिच्छू अब विज्ञान की पकड़ में, मिट्टी की खास किस्म से जुड़े बड़े खुलासे ने दुनिया को चौंकाया
नई दिल्ली: दुनिया भर में हर साल 10 से 20 लाख लोग बिच्छू के डंक का शिकार होते हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में तेज दर्द, सूजन और कुछ दिनों की परेशानी होती है, लेकिन हजारों मामलों में यह डंक जानलेवा साबित होता है। एक चिंताजनक आंकड़े के मुताबिक जहरीले बिच्छुओं के कारण हर साल करीब 3,000 बच्चों की मौत हो जाती है।
अफ्रीका, मिडिल ईस्ट, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में यह समस्या सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। अब एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने बिच्छुओं के व्यवहार को लेकर ऐसा खुलासा किया है जो भविष्य में हजारों जिंदगियां बचा सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ गॉलवे की वेनम सिस्टम्स लैब के प्रमुख मिशेल डुगन और उनकी अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा की गई यह रिसर्च ‘एनवायरमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशंस’ जर्नल में प्रकाशित हुई है। इस अध्ययन में मोरक्को को आधार बनाते हुए जहरीले बिच्छुओं के रहने के पैटर्न की गहराई से जांच की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि बिच्छुओं की मौजूदगी केवल तापमान या मौसम पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मिट्टी का प्रकार उनके ठिकाने तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।

मिट्टी का चुनाव क्यों करते हैं बिच्छू?
स्टडी के मुताबिक दुनिया में बिच्छुओं की 2,000 से ज्यादा प्रजातियां हैं, लेकिन इनमें से करीब 100 ही अत्यधिक जहरीली और इंसानों के लिए खतरनाक मानी जाती हैं। ये जहरीली प्रजातियां हर जगह नहीं पनपतीं। वे खास प्रकार की मिट्टी को चुनती हैं, जहां उन्हें सुरंग बनाने, छिपने और शिकार करने में आसानी हो।
वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडलिंग, सैटेलाइट डेटा, जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS) और वर्षों के फील्ड ऑब्जर्वेशन को मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला। शोध में पाया गया कि जिन इलाकों की मिट्टी में नमी सोखने की संतुलित क्षमता होती है, जो बहुत ज्यादा कठोर नहीं होती और जिसमें खुदाई करना आसान होता है, वहां जहरीले बिच्छुओं की संख्या अधिक पाई गई।
बिच्छू दिन में जमीन के अंदर छिपे रहते हैं और रात में शिकार के लिए बाहर निकलते हैं। इसलिए उनके लिए ऐसी मिट्टी जरूरी होती है जिसमें वे स्थायी सुरंग बना सकें। अगर मिट्टी बहुत रेतीली हो तो सुरंग ढह सकती है, और अगर बहुत कठोर हो तो खुदाई मुश्किल हो जाती है। यही कारण है कि वे ‘चूजी’ यानी चयनशील होते हैं।

मोरक्को बना रिसर्च का मॉडल
मोरक्को उन देशों में से है जहां बिच्छू के डंक के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं। यहां शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जहरीले बिच्छुओं की मौजूदगी दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं ने मोरक्को के अलग-अलग क्षेत्रों से मिट्टी के नमूने और बिच्छुओं की उपस्थिति के डेटा इकट्ठा किए। इसके बाद मशीन लर्निंग मॉडल के जरिए यह आकलन किया गया कि किन भौगोलिक क्षेत्रों में जहरीली प्रजातियां सबसे अधिक पनप सकती हैं।
इस मॉडल ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि मिट्टी का प्रकार तापमान, वर्षा और ऊंचाई जैसे कारकों से अधिक प्रभावशाली है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब केवल जलवायु डेटा के आधार पर जोखिम का अनुमान लगाने की बजाय, मिट्टी के नक्शों के आधार पर अधिक सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है।
हाई-रिस्क मैपिंग से कैसे बचेगी जान?
मिशेल डुगन के अनुसार, बिच्छू का जहर बच्चों पर सबसे ज्यादा असर डालता है क्योंकि उनके शरीर का आकार छोटा होता है और जहर तेजी से पूरे शरीर में फैल सकता है। ग्रामीण इलाकों में अक्सर अस्पताल दूर होते हैं और एंटी-वेनम समय पर उपलब्ध नहीं हो पाता।

नई तकनीक के जरिए स्वास्थ्य विभाग उन इलाकों की पहले से पहचान कर सकता है जहां जहरीले बिच्छुओं की संभावना ज्यादा है। वहां के अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी-वेनम की पर्याप्त व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही स्थानीय लोगों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाए जा सकते हैं, जैसे—
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रात में बाहर निकलते समय जूते पहनना
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घरों के आसपास की मिट्टी और पत्थरों की नियमित सफाई
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बच्चों को जमीन पर बिना चादर के न सुलाना
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घरों की दीवारों और फर्श में दरारें भरना
अगर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान हो जाए तो स्वास्थ्य सेवाएं अधिक प्रभावी और लक्षित तरीके से काम कर सकती हैं।
भारत के लिए क्यों है अहम?
भारत में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में बिच्छू के डंक के मामले सामने आते हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग, खासकर किसान और बच्चे, अधिक जोखिम में रहते हैं। कई बार जागरूकता की कमी और इलाज में देरी के कारण गंभीर परिणाम सामने आते हैं।

यदि इस स्टडी में विकसित मॉडल को भारत के भौगोलिक और मिट्टी के आंकड़ों के साथ लागू किया जाए तो हाई-रिस्क गांवों और जिलों की पहचान की जा सकती है। भारतीय मौसम विभाग और कृषि विभाग के पास पहले से मिट्टी के विस्तृत नक्शे उपलब्ध हैं। इन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय के डेटा के साथ जोड़कर एक राष्ट्रीय स्तर की ‘स्कॉर्पियन रिस्क मैप’ तैयार की जा सकती है।
एंटी-वेनम रिसर्च में नया मोड़
अब तक अधिकतर वैज्ञानिक शोध बिच्छू के जहर की रासायनिक संरचना और उसके इलाज पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन यह नई स्टडी बिच्छुओं की इकोलॉजी यानी उनके रहने के पैटर्न को समझने पर जोर देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पता हो कि कौन-सी प्रजाति किस क्षेत्र में अधिक पाई जाती है, तो उसी के अनुरूप एंटी-वेनम तैयार किया जा सकता है।
इससे एंटी-वेनम अधिक प्रभावी होगा और दुष्प्रभाव कम होंगे। साथ ही मेडिकल स्टाफ को भी यह जानकारी होगी कि किस क्षेत्र में किस प्रकार का जहर अधिक देखने को मिल सकता है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
हालांकि इस स्टडी में मिट्टी को प्रमुख कारक बताया गया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न के कारण मिट्टी की संरचना और नमी में बदलाव हो सकता है, जिससे बिच्छुओं का वितरण भी बदल सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में मिट्टी और जलवायु दोनों कारकों को मिलाकर एक डायनामिक मॉडल तैयार किया जाना चाहिए, जो समय के साथ अपडेट होता रहे। इससे आने वाले वर्षों में जोखिम वाले क्षेत्रों का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा।
सामाजिक और आर्थिक असर
बिच्छू के डंक का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। ग्रामीण परिवारों के लिए इलाज का खर्च आर्थिक बोझ बन जाता है। कई मामलों में अस्पताल तक पहुंचने में देरी के कारण स्थायी शारीरिक नुकसान भी हो सकता है।
यदि हाई-रिस्क क्षेत्रों की पहचान पहले से हो जाए तो सरकारें वहां विशेष स्वास्थ्य शिविर, एंटी-वेनम स्टॉक और जागरूकता कार्यक्रम चला सकती हैं। इससे न केवल मौतों की संख्या घटेगी बल्कि आर्थिक नुकसान भी कम होगा।
आगे की राह
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मॉडल अन्य देशों में भी लागू किया जा सकता है। ब्राजील, ईरान, सऊदी अरब और भारत जैसे देशों में जहां बिच्छू की समस्या गंभीर है, वहां स्थानीय डेटा के साथ इस तकनीक को अपनाया जा सकता है।
आने वाले समय में ड्रोन सर्वे, सैटेलाइट इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से और भी सटीक मैपिंग संभव हो सकेगी। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बनेंगी।
निष्कर्ष
जहरीले बिच्छू सदियों से मानव जीवन के लिए खतरा बने हुए हैं, लेकिन अब विज्ञान उनकी छिपने की जगह तक पहुंच चुका है। मिट्टी के प्रकार के आधार पर हाई-रिस्क इलाकों की पहचान करने वाली यह नई स्टडी एक बड़ा कदम है। अगर इस तकनीक को वैश्विक स्तर पर अपनाया गया, तो हर साल हजारों बच्चों और वयस्कों की जान बचाई जा सकती है।
यह रिसर्च केवल एक वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक संभावित क्रांति है। अब सवाल यह है कि दुनिया के देश इस खोज को कितनी तेजी से अपनाते हैं और इसे जमीन पर उतारते हैं।




