SPECIAL STORY: एक जलेबी, एक मज़ाक… और हमेशा के लिए बदल गया चौराहे का नाम
जानिए चूरू के “जलेबी चौराहे” की वो कहानी, जो आज भी मुस्कान के साथ सुनाई जाती है
राजस्थान के चूरू शहर में जब भी कोई नया व्यक्ति रास्ता पूछता है और उसे कहा जाता है — “जलेबी चौराहे से दाएं मुड़ जाना” — तो वह अनायास ही मुस्कुरा देता है। कई लोग समझते हैं कि जरूर वहां कोई मशहूर मिठाई की दुकान होगी, जहां गरमा-गरम जलेबियां छनती होंगी। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। इस नाम के पीछे छिपी है एक पुरानी, दिलचस्प और थोड़ी सी शरारती कहानी, जिसने एक सेठ और उसके परिवार की पहचान ही बदल दी।
चूरू का वो दौर
यह कहानी आज से करीब 70-80 साल पहले की बताई जाती है, जब चूरू का यह इलाका शहर का प्रमुख व्यापारिक मार्ग हुआ करता था। उसी मार्ग पर एक विशाल हवेली थी — ऊंचे दरवाजे, नक्काशीदार झरोखे और अंदर बड़ा सा आंगन। इस हवेली में रहते थे शहर के प्रसिद्ध सेठ हरिराम। कपड़े और अनाज के बड़े व्यापारी, जिनकी गिनती शहर के रईस लोगों में होती थी।
सेठ हरिराम अपनी सख्त छवि और अनुशासन के लिए जाने जाते थे। शहर में उनका नाम इज्जत से लिया जाता था। साफा बांधने का उनका अंदाज भी अलग था — ऊंचा, सलीकेदार और हमेशा करीने से बंधा हुआ। लोग कहते थे कि सेठ जी का साफा उनके सम्मान की तरह था — कभी झुकता नहीं।
एक समारोह… और एक शरारत
एक दिन शहर में एक बड़ा सामाजिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। व्यापारियों, प्रतिष्ठित परिवारों और शहर के गणमान्य लोगों को न्योता भेजा गया। सेठ हरिराम भी अपनी शान के साथ पहुंचे। साफा बांधे, हाथ में चांदी की मूठ वाली छड़ी, और चेहरे पर वही गंभीर भाव।
कार्यक्रम में मिठाइयों की भरमार थी — लड्डू, बालूशाही और ताज़ी-ताज़ी जलेबियां। शहर के कुछ नौजवान, जो अपने शरारती स्वभाव के लिए मशहूर थे, मज़ाक के मूड में थे। उनमें से एक ने फुसफुसाकर कहा, “देखो, अगर सेठ जी के साफे में जलेबी रख दी जाए तो?”
सब हंस पड़े। किसी ने इसे असंभव बताया, तो किसी ने चुनौती मान ली।
मौका देखकर एक युवक चुपके से पीछे आया और मज़ाक-मज़ाक में एक छोटी सी जलेबी सेठ जी के साफे के ऊपर रख दी। जलेबी की चाशनी धीरे-धीरे साफे में समाने लगी, लेकिन सेठ जी को इसका आभास नहीं हुआ।
अचानक भीड़ में से आवाज आई —
“अरे देखो! जलेबी चोर… जलेबी चोर!”
लोगों ने देखा तो सचमुच सेठ जी के साफे पर जलेबी रखी थी। कुछ लोग हंस पड़े, कुछ चौंक गए। सेठ जी को जब एहसास हुआ, तो उनका चेहरा लाल हो गया। उन्होंने तुरंत साफा उतारा, लेकिन तब तक “जलेबी चोर” का नारा मज़ाक में फैल चुका था।
मज़ाक जो भारी पड़ गया
सेठ हरिराम के लिए यह घटना मज़ाक नहीं थी। उन्हें लगा कि उनकी प्रतिष्ठा पर चोट पहुंची है। उन्होंने घर आकर परिवार के सामने नाराजगी जताई। हवेली के बाहर उस दिन से लोगों की फुसफुसाहट शुरू हो गई।
धीरे-धीरे यह मज़ाक शहर की गली-गली में पहुंच गया। बच्चे हवेली के सामने से गुजरते हुए गुनगुनाते —
“जलेबी चोर की हवेली…”
लोग हंसते, ठिठोली करते। पहले तो परिवार ने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन नाम जैसे चिपक गया।
हवेली से चौराहे तक
जिस स्थान पर हवेली थी, वहीं एक छोटा सा चौराहा भी पड़ता था। लोग रास्ता बताते हुए कहने लगे —
“अरे, जलेबी चोर वाली हवेली के पास वाला चौराहा…”
धीरे-धीरे यह छोटा वाक्य छोटा होकर रह गया —
“जलेबी चौराहा।”
समय बीतता गया। नई पीढ़ी आई। किसी को असली घटना याद नहीं रही, लेकिन नाम रह गया। दुकानदारों ने भी इसे अपनाना शुरू कर दिया। बसों के कंडक्टर आवाज लगाने लगे —
“जलेबी चौराहा… उतरना है तो तैयार हो जाओ!”
बुजुर्गों की यादें
शहर के बुजुर्ग असगर अली और राजकुमार शर्मा आज भी उस किस्से को मुस्कुराते हुए सुनाते हैं। उनके अनुसार, “वो बस एक छोटा सा मज़ाक था, लेकिन उस समय के समाज में इज्जत बहुत मायने रखती थी। सेठ जी को यह नाम पसंद नहीं था, पर शहर ने उसे अपना लिया।”
वे बताते हैं कि कई सालों तक परिवार को यह तंज सहना पड़ा। कुछ रिश्तेदारों ने तो शादी-ब्याह में भी इस नाम को लेकर चुटकी ली। लेकिन समय के साथ परिवार ने भी इसे स्वीकार कर लिया।
वक्त का बदलाव
आज उस हवेली का स्वरूप बदल चुका है। कुछ हिस्से किराए पर हैं, कुछ में दुकानें खुल गई हैं। लेकिन चौराहे का नाम वही है — जलेबी चौराहा।
कई पर्यटक जब यह नाम सुनते हैं तो फोटो खिंचवाते हैं। सोशल मीडिया पर भी यह नाम मज़ेदार लोकेशन के रूप में शेयर होता है। किसी को नहीं पता कि एक साधारण सी जलेबी ने कैसे एक पूरे इलाके की पहचान तय कर दी।
नाम में छिपी सीख
यह कहानी सिर्फ एक मज़ाक की नहीं है। यह बताती है कि समाज किस तरह किसी छोटी घटना को बड़ा रूप दे देता है। एक पल की शरारत कभी-कभी जीवनभर की पहचान बन जाती है।
सेठ हरिराम शायद उस दिन बहुत आहत हुए होंगे। लेकिन वक्त ने उस घटना को कड़वाहट से निकालकर एक रोचक किस्से में बदल दिया।
आज जब लोग “जलेबी चौराहा” कहते हैं, तो उनके चेहरे पर मुस्कान होती है — ना कि तंज। शहर की पहचान बन चुका यह नाम अब चूरू की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।
एक जलेबी की विरासत
कभी-कभी इतिहास बड़े युद्धों या राजाओं से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी घटनाओं से बनता है।
चूरू का जलेबी चौराहा उसी का उदाहरण है — जहां एक मीठी जलेबी ने शहर की जुबान पर हमेशा के लिए अपना स्वाद छोड़ दिया।
और शायद यही इस कहानी की सबसे प्यारी बात है —
कि जीवन में कुछ घटनाएं चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हों, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मुस्कान बन सकती हैं।



