Gajab Raat Review: रिश्वतखोर पुलिसवाले के किरदार में छाए मनोज बाजपेयी, एक रात की कहानी में खुलता है साजिशों का जाल
अभिनय के लिए देखी जा सकती है ‘गजब रात’

Gajab Raat Review: दिल्ली की अंधेरी रात, एक घायल युवती और ऐसा पुलिस अधिकारी जिसकी प्राथमिकता कानून से ज्यादा अपनी जेब भरना है। ‘गजब रात’ इन्हीं किरदारों के जरिए अपराध, भ्रष्टाचार और सत्ता के गठजोड़ की कहानी पेश करती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मनोज बाजपेयी हैं, जो अपने किरदार की चालाकी, स्वार्थ और भीतर बची संवेदनशीलता को असरदार तरीके से सामने लाते हैं।
नीरज पांडे के निर्माण और रितेश शाह के निर्देशन में बनी यह क्राइम थ्रिलर 23 अक्टूबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है। एक ही रात में आगे बढ़ती कहानी में पुलिस अधिकारी के फैसले उसे लगातार नई मुश्किलों में डालते हैं।
एक घटना से बदल जाती है पूरी रात
कहानी के केंद्र में दिल्ली पुलिस का अधिकारी अजय दीक्षित है, जिसे मनोज बाजपेयी ने निभाया है। अजय ऐसा पुलिसवाला है जो वर्दी का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करने से नहीं हिचकता। उसकी जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आता है, जब कॉनॉट प्लेस में एक घायल युवती को चलती गाड़ी से फेंके जाने का मामला सामने आता है।
शुरुआत में सामान्य लगने वाला मामला धीरे-धीरे खतरनाक साजिश का रूप लेने लगता है। जांच आगे बढ़ती है तो पुलिस, राजनीति और अफसरशाही से जुड़े हित सामने आने लगते हैं। हर व्यक्ति कुछ छिपा रहा है और हर नई जानकारी पिछले सच पर सवाल खड़े करती है।
दिलचस्प बात यह है कि इस मामले की तह तक पहुंचने वाला अजय खुद कोई आदर्श पुलिस अधिकारी नहीं है। उसके भीतर लालच भी है और सही-गलत की समझ भी। यही टकराव कहानी को दिलचस्प बनाता है।
मनोज बाजपेयी के अभिनय में दिखती हैं किरदार की कई परतें
मनोज बाजपेयी फिल्म को अपने अभिनय से मजबूती देते हैं। अजय के किरदार में वह कभी बेपरवाह नजर आते हैं, कभी चालाक और कभी परिस्थितियों को समझकर तुरंत अपना रुख बदलते दिखाई देते हैं। उनके चेहरे के भाव और संवाद बोलने का अंदाज कई दृश्यों को प्रभावी बनाते हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत हो या किसी संदिग्ध से सामना, मनोज अपने किरदार का अलग रंग सामने लाते हैं। उनकी अदाकारी अजय को एक सामान्य भ्रष्ट पुलिसवाले तक सीमित नहीं रहने देती। उसके भीतर मौजूद विरोधाभास दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखते हैं।
फिल्म में कई ऐसे मौके आते हैं, जहां कहानी से ज्यादा मनोज का प्रदर्शन ध्यान खींचता है। गंभीर परिस्थितियों के बीच उनके संवादों से निकलने वाला सूखा हास्य भी राहत देता है।
सस्पेंस और संवाद रखते हैं कहानी को दिलचस्प
एक ही रात में घटनाओं का आगे बढ़ना फिल्म के पक्ष में जाता है। किरदारों के पास फैसले लेने का समय कम है और गलत कदम की कीमत बड़ी हो सकती है। इससे कहानी में जल्दबाजी और दबाव का अहसास बना रहता है।
फिल्म के संवाद इसकी अच्छी बातों में शामिल हैं। सत्ता और व्यवस्था के बीच फंसे किरदारों की बातचीत कई जगह तीखी लगती है। नुसरत भरूचा, दिव्या दत्ता और अक्षय ओबेरॉय भी अपने किरदारों के जरिए कहानी को सहारा देते हैं।
दिल्ली की रात का माहौल और प्रभावशाली लोगों के बीच चलने वाला हितों का खेल फिल्म की अपराध कथा को उपयुक्त पृष्ठभूमि देता है।
कुछ मोड़ों पर कमजोर पड़ती है पकड़
फिल्म की सभी चालें चौंकाने वाली नहीं हैं। क्राइम और राजनीतिक साजिशों वाली थ्रिलर देखने वाले दर्शक कुछ घटनाओं का अंदाजा पहले ही लगा सकते हैं। ऐसे हिस्सों में रहस्य का असर कम हो जाता है।
कुछ जगह कहानी बातें समझाने में जरूरत से ज्यादा समय लेती है, जिससे रफ्तार प्रभावित होती है। बैकग्राउंड संगीत भी हर तनावपूर्ण दृश्य को उतनी मजबूती नहीं दे पाता, जितनी उससे अपेक्षा रहती है।
इन कमियों के कारण फिल्म शुरुआत से अंत तक एक जैसी पकड़ नहीं बनाए रखती। हालांकि, मनोज बाजपेयी का अभिनय कमजोर हिस्सों में भी देखने की दिलचस्पी बनाए रखता है।
अभिनय के लिए देखी जा सकती है ‘गजब रात’
‘गजब रात’ की खासियत उसका मुख्य किरदार और उसे निभाने वाले मनोज बाजपेयी हैं। फिल्म ऐसे पुलिसवाले की कहानी दिखाती है जो अपनी कमजोरियों के बावजूद एक मुश्किल मामले में उलझ जाता है और जिसके हर फैसले के साथ दांव बढ़ते जाते हैं।
अगर आपको भ्रष्ट व्यवस्था, सियासी साजिश और नैतिक उलझनों वाले किरदारों की कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म देखने का विकल्प हो सकती है। कुछ अनुमान लगाने योग्य मोड़ों और असमान रफ्तार के बावजूद मनोज बाजपेयी का प्रदर्शन इसे एक बार देखने लायक बनाता है।
