नई दिल्ली। आज का दिन, 23 फरवरी, चिकित्सा इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज है। 23 फरवरी 1954 को पहली बार बच्चों को पोलियो का टीका लगाया गया था। अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य के पिट्सबर्ग स्थित आर्सेनल एलीमेंट्री स्कूल में स्कूली बच्चों के एक समूह को डॉ. जोनास साल्क द्वारा विकसित पोलियो वैक्सीन का पहला इंजेक्शन दिया गया। यह कदम दुनिया को एक ऐसी बीमारी से बचाने की दिशा में निर्णायक साबित हुआ, जिसे उस समय लगभग लाइलाज और भयावह माना जाता था।
पोलियोमाइलाइटिस एक अत्यधिक संक्रामक बीमारी थी, जो तंत्रिका कोशिकाओं और कभी-कभी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करती थी। इसके कारण मांसपेशियों का क्षय, स्थायी पक्षाघात और कई मामलों में मृत्यु तक हो जाती थी। 20वीं शताब्दी में चिकित्सा क्षेत्र में सुधार के बावजूद पोलियो के प्रकोप लगातार सामने आते रहे और खासकर बच्चों को इसका शिकार बनाते रहे।
1921 में अमेरिका के भावी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट भी पोलियो से प्रभावित हुए थे, जिससे उनके पैरों में स्थायी लकवा हो गया था। इस बीमारी से निपटने के लिए 1940 के दशक के उत्तरार्ध में ‘मार्च ऑफ डाइम्स’ नामक संगठन ने पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के वायरस अनुसंधान प्रमुख डॉ. जोनास साल्क से संपर्क किया।
साल्क ने शोध के दौरान पाया कि पोलियो के तीन मुख्य प्रकार हैं और एक प्रभावी टीके को तीनों से लड़ने में सक्षम होना चाहिए। उन्होंने पोलियो वायरस के नमूनों को विकसित कर फॉर्मेलिन नामक रसायन से निष्क्रिय किया और ऐसा टीका तैयार किया जो शरीर में प्रतिरक्षा पैदा करे, लेकिन संक्रमण न फैलाए।
1954 में बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान शुरू हुआ। शुरुआती दौर में एक दोषपूर्ण बैच के कारण करीब 200 मामले सामने आए, लेकिन उत्पादन मानकों में सुधार के बाद अगस्त 1955 तक लगभग 40 लाख लोगों को टीका लगाया जा चुका था। अमेरिका में पोलियो के मामले 1955 में 14,647 से घटकर 1956 में 5,894 रह गए। 1959 तक लगभग 90 देशों ने साल्क के टीके को अपनाया।
बाद में अल्बर्ट सैबिन द्वारा विकसित ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) में जीवित लेकिन कमजोर वायरस का उपयोग किया गया। 1962 में इसे लाइसेंस मिला और यह सस्ता व आसान होने के कारण व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ।
हालांकि पोलियो का आज भी कोई सीधा इलाज नहीं है, लेकिन टीकाकरण के कारण दुनिया भर में इसके मामलों में लगभग 99 प्रतिशत की कमी आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अब यह बीमारी केवल कुछ गरीब और हाशिए पर स्थित क्षेत्रों तक सीमित रह गई है।
23 फरवरी का यह दिन मानवता की उस जीत की याद दिलाता है, जब विज्ञान और शोध ने मिलकर एक भयावह बीमारी पर ऐतिहासिक विजय हासिल की।




