Environment: हर साल बचा सकते हैं लाखों पेड़! टिशू पेपर की जगह हाथ सुखाने के लिए अपनाएं ये आसान तरीका
टिशू पेपर के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की जरूरत
नई दिल्ली। ऑफिस, मॉल, होटल या किसी सार्वजनिक जगह के वॉशरूम में हाथ धोने के बाद टिशू पेपर से हाथ सुखाना आज बेहद आम हो गया है। एक व्यक्ति दिन में कुछ टिशू इस्तेमाल करता है, लेकिन जब यही आदत सैकड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है तो कागज की खपत काफी बढ़ जाती है। इसका सीधा संबंध पेड़ों, पानी और ऊर्जा की खपत से है।
ऐसे में टिशू पेपर की जगह हैंड ड्रायर या अपने साथ रखा हुआ कपड़े का रूमाल/नेपकिन इस्तेमाल करना पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे टिशू की खपत और उससे पैदा होने वाले कचरे को कम किया जा सकता है।
टिशू पेपर के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की जरूरत
पर्यावरण पर काम करने वाली कंसल्टेंसी फर्म ‘Edge’ की अप्रैल 2022 की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि टिशू पेपर के उत्पादन के लिए दुनिया में हर दिन 10 लाख से अधिक पेड़ों की जरूरत पड़ती है। रिपोर्ट के मुताबिक यदि रिसाइकलिंग का विकल्प उपलब्ध न हो तो यह संख्या करीब 20 लाख पेड़ प्रतिदिन तक पहुंच सकती है।
भारत में टिशू पेपर के लिए पेड़ों की कटाई का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन विभिन्न रिपोर्टों में अनुमान लगाया गया है कि एक टन टिशू पेपर के उत्पादन में करीब 17 पेड़ों की जरूरत पड़ सकती है।
भारत में भी टिशू पेपर की मांग लगातार बढ़ रही है। Paper Mart की एक रिपोर्ट के अनुसार 2018 में भारत में टिशू पेपर की अनुमानित मांग करीब 1.69 लाख टन थी, जो 2032 तक बढ़कर लगभग 5.50 लाख टन होने का अनुमान लगाया गया है।
टिशू पेपर बनाने में पानी और कच्चे माल की खपत
टिशू पेपर का उत्पादन मुख्य रूप से लकड़ी से प्राप्त फाइबर या रिसाइकल फाइबर से किया जाता है। इसके निर्माण में बड़ी मात्रा में पानी की भी जरूरत होती है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार एक टन टिशू पेपर बनाने में करीब 10 हजार से 17 हजार लीटर पानी तक खर्च हो सकता है।
टिशू को सफेद और मुलायम बनाने की प्रक्रिया में भी कई तरह के रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। पहले ब्लीचिंग में क्लोरीन का इस्तेमाल ज्यादा होता था, लेकिन अब कई निर्माता क्लोरीन-फ्री या कम क्लोरीन वाली प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं।
एक और बड़ी समस्या यह है कि इस्तेमाल किया हुआ टिशू पेपर आमतौर पर दोबारा रिसाइकल नहीं किया जा सकता। इस्तेमाल के बाद यह सीधे कचरे का हिस्सा बन जाता है।
हैंड ड्रायर बन सकता है विकल्प
वॉशरूम में टिशू की खपत कम करने का एक तरीका इलेक्ट्रिक हैंड ड्रायर का इस्तेमाल है। कई ऑफिस, मॉल, एयरपोर्ट और होटल में अब ऐसी मशीनें लगाई जा रही हैं। हाथ सुखाने के लिए टिशू की जगह ड्रायर का इस्तेमाल करने से कागज की खपत और उससे बनने वाले कचरे को कम किया जा सकता है।
कुछ कंपनियों ने अपने अध्ययनों में हैंड ड्रायर के इस्तेमाल से टिशू की खपत और पेड़ों की कटाई में कमी का दावा किया है। उदाहरण के तौर पर अमेरिकी कंपनी Zurn Water Solutions ने 2021 में दावा किया था कि उसकी हैंड ड्रायर मशीनों ने एक साल में करीब 5 अरब टिशू पेपर के इस्तेमाल को रिप्लेस किया, जिससे करीब 2 लाख पेड़ों को बचाने में मदद मिली।
इसी तरह World Dryer ने अमेरिकी स्कूलों में हैंड ड्रायर लगाने के बाद कचरे और पेपर की खपत में कमी के आंकड़े पेश किए थे। हालांकि, अलग-अलग परिस्थितियों में पर्यावरणीय लाभ बिजली के स्रोत, मशीन की दक्षता और इस्तेमाल की अवधि पर निर्भर कर सकते हैं।
क्या सिर्फ हैंड ड्रायर ही समाधान है?
हैंड ड्रायर टिशू की खपत कम करने का एक विकल्प जरूर है, लेकिन इसे हर स्थिति में सबसे अच्छा विकल्प मानना सही नहीं होगा। इलेक्ट्रिक ड्रायर भी बिजली का इस्तेमाल करते हैं और उनकी पर्यावरणीय लागत इस बात पर निर्भर करती है कि बिजली किस स्रोत से आ रही है।
इसके अलावा, वॉशरूम में टिशू का इस्तेमाल सिर्फ हाथ सुखाने तक सीमित नहीं है। ऐसे में पूरी तरह टिशू से छुटकारा पाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी आदत बदलना जरूरी है।
रूमाल या कपड़े का नेपकिन भी बेहतर विकल्प
अगर संभव हो तो रोजमर्रा की जिंदगी में कपड़े का रूमाल या दोबारा इस्तेमाल किया जा सकने वाला नेपकिन साथ रखना एक आसान विकल्प है। इसे नियमित रूप से धोकर दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे डिस्पोजेबल पेपर की जरूरत काफी कम हो सकती है।
हालांकि, सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। हाथ धोने के बाद उन्हें अच्छी तरह सुखाना चाहिए और व्यक्तिगत स्वच्छता से समझौता नहीं करना चाहिए।
छोटी-सी आदत में बदलाव भी बड़े स्तर पर असर डाल सकता है। अगर बड़ी संख्या में लोग जरूरत के मुताबिक ही टिशू का इस्तेमाल करें और जहां संभव हो वहां रीयूजेबल कपड़े या प्रभावी हैंड ड्रायर का इस्तेमाल करें, तो पेपर की खपत और कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है।




