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तेल ने बदली सऊदी-ईरान की किस्मत, थोरियम बदल सकता है भारत का भविष्य! परमाणु वैज्ञानिक की बड़ी चेतावनी

भारत के विशाल थोरियम भंडार को नजरअंदाज करना ‘आत्मघाती’ हो सकता है, डॉ. अनिल काकोडकर ने दी चेतावनी।

पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और खाड़ी क्षेत्र के संघर्ष ने एक बार फिर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और परमाणु ईंधन के आयात पर निर्भर है, जबकि देश के पास खुद के बड़े तेल भंडार नहीं हैं और घरेलू यूरेनियम संसाधन भी सीमित हैं।

ऐसे में परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोडकर ने चेतावनी दी है कि भारत के विशाल थोरियम भंडार की अनदेखी करना देश के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। उनका कहना है कि भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जो आने वाले करीब 250 वर्षों तक स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है।

डॉ. काकोडकर के अनुसार यदि भारत थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को पूरी तरह लागू कर लेता है तो वह केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर सकता है बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में भी महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह तेल ने सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों की किस्मत बदल दी, उसी तरह थोरियम भारत के भविष्य को बदलने की क्षमता रखता है।

हालांकि भारत का थोरियम आधारित परमाणु कार्यक्रम पिछले करीब 20 वर्षों से धीमी गति से आगे बढ़ रहा है और कई योजनाएं अभी भी कागजों तक सीमित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भारत का मूल तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि सीमित यूरेनियम संसाधनों के बावजूद देश लंबे समय तक परमाणु ऊर्जा प्राप्त कर सके। इस योजना के तहत पहले चरण में यूरेनियम आधारित रिएक्टर, दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और तीसरे चरण में थोरियम आधारित रिएक्टरों का विकास किया जाना था। लेकिन तकनीकी चुनौतियों, संस्थागत प्राथमिकताओं और जटिल ईंधन पुनर्संसाधन प्रक्रियाओं के कारण यह कार्यक्रम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया।

डॉ. काकोडकर का मानना है कि थोरियम के बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए भारत को अपने विखंडनीय पदार्थ भंडार को बढ़ाना होगा, जिसके लिए फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और एक्सीलरेटर-ड्रिवेन सिस्टम जैसे उन्नत तकनीकी समाधान अपनाने होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत हैवी वाटर रिएक्टर तकनीक में वैश्विक स्तर पर अग्रणी है और थोरियम इन रिएक्टरों में सबसे बेहतर तरीके से काम करता है। इसके अलावा मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित एडवांस्ड हैवी वाटर रिएक्टर (AHWR) जैसी स्वदेशी तकनीकें भारत को थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन में आगे ले जा सकती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत थोरियम कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाता है तो वह भविष्य में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है और ऊर्जा आयात पर निर्भरता भी काफी कम कर सकता है। केंद्र सरकार भी सार्वजनिक रूप से थोरियम आधारित ऊर्जा के महत्व को स्वीकार कर चुकी है। केंद्रीय विज्ञान मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में कहा है कि थोरियम भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का एक प्रमुख आधार है और यह दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

डॉ. काकोडकर का स्पष्ट संदेश है कि थोरियम कोई वैकल्पिक प्रयोग नहीं बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है। उनके अनुसार यदि इस दिशा में तेजी से काम नहीं किया गया तो देश को आने वाले दशकों में भारी ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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