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NATIONAL NEWS: परमाणु ऊर्जा में भारत की बड़ी छलांग — PFBR से सदियों की आत्मनिर्भरता का रास्ता तैयार

जहां अमेरिका-जापान पीछे हटे, वहां भारत ने दिखाई हिम्मत… अब थोरियम के दम पर ऊर्जा सुरक्षा की नई कहानी

NATIONAL NEWS: भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) को सफलतापूर्वक क्रिटिकल अवस्था तक पहुंचा दिया है, जो इस बात का संकेत है कि अब इसमें न्यूक्लियर चेन रिएक्शन लगातार अपने आप चल सकता है।

यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि जिस फास्ट ब्रीडर तकनीक से अमेरिका, जापान और फ्रांस जैसे विकसित देश तकनीकी चुनौतियों और भारी लागत के कारण पीछे हट गए, उसी राह पर भारत न सिर्फ डटा रहा बल्कि अब सफलता के करीब भी पहुंच गया है। आने वाले महीनों में इस रिएक्टर की क्षमता धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी और अगर सबकुछ योजना के अनुसार रहा तो वर्ष के अंत तक यहां से बिजली उत्पादन शुरू हो सकता है।

भारत के इस कदम के पीछे सबसे बड़ी वजह उसकी ऊर्जा आत्मनिर्भरता की जरूरत है। देश के पास यूरेनियम के सीमित भंडार हैं और तेल-गैस के लिए वह लंबे समय से विदेशी देशों, खासकर खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहा है। वैश्विक संकटों और युद्धों ने यह स्पष्ट कर दिया कि बाहरी संसाधनों पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है। ऐसे में भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए उन संसाधनों पर ध्यान केंद्रित किया, जो उसके पास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं—जैसे थोरियम। दुनिया के कुल थोरियम भंडार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा भारत के पास है, और यही भविष्य में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनने वाला है।

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की खासियत इसे पारंपरिक रिएक्टरों से अलग बनाती है। सामान्य रिएक्टर जहां ईंधन को जलाकर ऊर्जा पैदा करते हैं, वहीं ब्रीडर रिएक्टर जितना ईंधन खर्च करते हैं, उससे अधिक नया ईंधन तैयार भी करते हैं। कलपक्कम PFBR का ब्रीडिंग रेशियो 1.05 है, यानी यह उपयोग किए गए ईंधन से ज्यादा नया ईंधन उत्पन्न करने में सक्षम है। यह तकनीक भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसकी परिकल्पना वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने की थी। पहले चरण में PHWR रिएक्टरों के जरिए यूरेनियम से प्लूटोनियम तैयार किया जाता है, दूसरे चरण में इसी प्लूटोनियम का उपयोग फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में होता है, और तीसरे चरण में थोरियम से यूरेनियम-233 बनाकर लंबे समय तक ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि जब तीसरा चरण पूरी तरह लागू हो जाएगा, तब भारत 500 से 700 वर्षों तक अपनी ऊर्जा जरूरतों को खुद पूरा करने में सक्षम हो सकता है। इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (IGCAR) के डायरेक्टर श्रीकुमार पिल्लई के अनुसार, यह उपलब्धि पिछले दो दशकों के वैज्ञानिक प्रयासों का परिणाम है और यह भारत को क्लोज्ड फ्यूल साइकिल वाले चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करती है।

हालांकि इस तकनीक तक पहुंचना आसान नहीं था। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में लिक्विड सोडियम का उपयोग किया जाता है, जो हवा और पानी के संपर्क में आते ही खतरनाक प्रतिक्रिया करता है। जापान के मोंजू रिएक्टर में 1995 में सोडियम लीक के कारण आग लगने की घटना ने दुनिया को इस तकनीक के जोखिम दिखाए थे। फ्रांस का सुपरफिनिक्स रिएक्टर भी भारी लागत और तकनीकी समस्याओं के कारण बंद करना पड़ा। लेकिन भारत ने पिछले 40 वर्षों में सोडियम हैंडलिंग, लीक डिटेक्शन और सुरक्षा तंत्र में महारत हासिल कर इन चुनौतियों को काफी हद तक नियंत्रित किया है।

इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (IGCAR) के डायरेक्टर श्रीकुमार पिल्लई

वर्तमान में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर से बिजली उत्पादन की लागत पारंपरिक रिएक्टरों की तुलना में अधिक है, जहां एक मेगावॉट बिजली बनाने में करीब 30 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ अनुभव बढ़ने पर यह लागत कम होगी और तकनीक अधिक प्रभावी बनेगी। भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, जिसमें PFBR जैसी परियोजनाएं अहम भूमिका निभाएंगी।

कलपक्कम, जिसका अर्थ ‘पथरीली जगह’ होता है, भारत के परमाणु सफर की कठिनाइयों का प्रतीक रहा है, लेकिन अब यही स्थान देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनता दिख रहा है। PFBR की सफलता न सिर्फ तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि यह उस दूरदर्शिता का परिणाम है, जिसने भारत को उन रास्तों पर आगे बढ़ने का साहस दिया, जहां विकसित देश भी रुक गए थे।

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