बिलासपुर में एड्स की बढ़ती चुनौती: संक्रमण के ट्रेंड में बड़ा बदलाव, एमएसएम और नशीले इंजेक्शन बने प्रमुख कारण

बिलासपुर। प्रदेश की न्यायधानी बिलासपुर में एड्स की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। सिम्स स्थित एआरटी सेंटर के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2010 से 2025 के बीच जिले में 9,423 एचआईवी/एड्स पीड़ित पंजीकृत हो चुके हैं। इनमें 5,492 पुरुष, 3,295 महिलाएं और 74 ट्रांसजेंडर शामिल हैं। वर्तमान में 4,472 मरीज नियमित उपचार पर हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एड्स संक्रमण का पारंपरिक स्वरूप अब तेजी से बदल रहा है। असुरक्षित महिला-पुरुष संबंधों के अलावा अब पुरुषों का पुरुषों से यौन संबंध (एमएसएम) और नशीले इंजेक्शन का साझा उपयोग संक्रमण के सबसे बड़े कारण बनकर सामने आए हैं।
हर वर्ग और हर उम्र प्रभावित
आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि 12 वर्ष से लेकर 65 वर्ष तक के लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। मजदूर वर्ग के साथ-साथ व्हाइट कॉलर और उच्च शिक्षित वर्ग भी इससे अछूता नहीं है। सबसे दुखद पहलू बच्चों का संक्रमित होना है, जिनमें 302 बालक और 260 बालिकाएं शामिल हैं।
एमएसएम से बढ़ता खतरा
जिले में 1,300 से अधिक ऐसे लोग चिन्हांकित किए गए हैं, जिनका इलाज एमएसएम श्रेणी में किया जा रहा है। सामाजिक लोकलाज और भय के कारण कई लोग जांच नहीं कराते, जिससे संक्रमण का दायरा और अधिक फैलने की आशंका बनी रहती है।
नशीले इंजेक्शन बन रहे जानलेवा
नशे के आदी लोग एक ही सिरिंज का बार-बार और कई लोगों के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं। आर्थिक मजबूरी और लत के कारण नई सुई न खरीद पाने से एचआईवी तेजी से फैल रहा है। यह प्रवृत्ति खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में चिंता का विषय बन गई है।
सेक्स वर्कर्स में भी संक्रमण
सामाजिक संस्थाओं के अनुसार जिले में पंजीकृत 4,462 सेक्स वर्कर्स में से 104 एचआईवी पॉजिटिव हैं। इनमें अधिकांश 25 से 35 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं हैं।
स्वास्थ्य विभाग की चिंता
एआरटी सेंटर के अधिकारियों का कहना है कि मरीजों को नियमित दवाएं और परामर्श उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन संक्रमण की रफ्तार चिंताजनक है। बदलते ट्रेंड को देखते हुए विशेष जागरूकता अभियान और काउंसलिंग तेज की गई है, ताकि समय रहते संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ा जा सके।
बढ़ता शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और जागरूकता की कमी बिलासपुर को एड्स के गंभीर खतरे की ओर धकेल रही है। अब जरूरत है सामूहिक जागरूकता, समय पर जांच और सामाजिक झिझक को तोड़ने की, ताकि इस जानलेवा बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके।





