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22 साल बाद इंसाफ, जग्गी हत्याकांड में अमित जोगी दोषी—हाईकोर्ट ने सुनाई उम्रकैद

ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा, CBI की अपील मंजूर—मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना बताया गलत

छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित 2003 रामावतार जग्गी हत्याकांड में बिलासपुर हाईकोर्ट ने बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पूरे मामले में बड़ा उलटफेर कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने CBI की अपील को स्वीकार करते हुए 2007 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को हत्या (धारा 302) और आपराधिक साजिश (धारा 120-बी) का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही कोर्ट ने 1000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसे न चुकाने पर अतिरिक्त सजा का प्रावधान किया गया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि एक ही गवाही के आधार पर कुछ आरोपियों को दोषी ठहराना और मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने इसे गंभीर त्रुटि मानते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोबारा खोला गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट में विस्तृत सुनवाई हुई।

गौरतलब है कि 4 जून 2003 को एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिससे प्रदेश की राजनीति में सनसनी फैल गई थी। इस मामले में कुल 31 आरोपी बनाए गए थे, जिनमें से 28 को पहले ही दोषी करार दिया जा चुका था, जबकि अमित जोगी को 2007 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। इसके बाद जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां से मामला फिर हाईकोर्ट भेजा गया।

रामावतार जग्गी न सिर्फ एक कारोबारी थे, बल्कि राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाते थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और लंबे समय से लंबित इस मामले में न्याय मिलने की चर्चा जोरों पर है।

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